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ग्वालियरदेशभोपालमध्य प्रदेशराजनीतिविशेष

वर्चस्व की लड़ाई में अस्तित्व खोती कांग्रेस

केंद्र में गाँधी परिवार तो सूबे में कमलनाथ तक सिमटकर रह गई कांग्रेस

एक समय था जब भारत वर्ष में कांग्रेस का एक तरफा राज था, विपक्ष के नाम पर सिंगल डिजिट में संसद में सांसद हुआ करते थे, भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस मुक्त भारत का नारा क्या दिया कांग्रेस खुद ब खुद हाशिए पर आती गई और इसका सबसे बड़ा कारण परिवारवाद और वर्चस्व की लड़ाई है । दशकों से कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष माँ और बेटे के बीच फुटबॉल बनकर घूम रहा है । मध्यप्रदेश में दस साल तक दिग्गी राजा का शासन तक था लेकिन फूटी सड़कें और बिजली की कमी ने कांग्रेस को परास्त कर भाजपा का कमल खिलाया, तब से लेकर भाजपा से मुँह की खाती रही और खाती ही जा रही है, मध्यप्रदेश भारतीय जनता पार्टी प्रदेश को कांग्रेस मुक्त बनाने के लिए प्रयासरत है तो वहीं स्वयं भाजपा कांग्रेस युक्त भी होती जा रही है ।
हाशिये पर चल रही कांग्रेस की स्थिति अब और बिगडती जा रही है। 15 साल का वनवास पूरा कर सत्ता में लौटी कांग्रेस में आंतरिक कलह ऐसी मची कि पहले मुख्यमंत्री पद को लेकर नूराकुश्ती हुई तो पीसीसी चीफ को लेकर आज तक प्रतिद्वंदता जारी है, खत्म होती कांग्रेस का कारण एक ही है वर्चस्व और वर्चस्व । पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने भले ही 2003 में दस साल तक राजनीति से सन्यास भले ही लिया हो लेकिन पुत्र को स्थापित करने की राजनीति वे हमेशा ही करते रहे , मध्यप्रदेश कांग्रेस में ज्योतिरादित्य सिंधिया को लगातार किनारे किए जाने की भी राजनीति होती रही है, सिंधिया के लोकसभा चुनाव हारने के बाद सिंधिया को पूरी तरह से लूप लाइन में लाकर खड़ा कर दिया, यानी दिग्गी और कमलनाथ की जोड़ी में सिंधिया को किनारे कर दिया , कांग्रेस के अंदर कई खेमे हैं, सिंधिया खेमा, दिग्गी गुट, कमलनाथ खेमा और वर्षों से खाली बैठे अजय सिंह राहुल भी पार्टी में खुद को स्थापित करना चाहते हैं, कांतिलाल भूरिया और कमलनाथ दोनों ने अपने पुत्रों को अपने राजनीतिक वारिस बनाकर जनता के सामने ला दिया एक ने सत्ता तो दूसरे ने संगठन में । देश तथा प्रदेश में वर्षो से मृत पडती जा रही कांग्रेस में अंदरूनी लडाई थमने का नाम नहीं ले रही है। कांग्रेस में नेता अपने वर्चस्व के लिये किसी भी हद तक नीचे जा रहे हैं। ऐसे में वास्तव में कांग्रेस अब कमजोर होगी क्योंकि वहां पर नेता अपने स्वार्थ के लिये लडाई लडने लगे हैं। अब यदि यह लडाई नहीं थमी तो आगामी नगरीय निकाय के चुनावों में भी कांग्रेस को हार का सामना करना पडेगा। अब देखना है कि मृत पडी कांग्रेस में बदलाव होंगे या फिर यूं ही कांग्रेस ढर्रे पर चलती रहेगी इसका इंतजार रहेगा। अब एक बार फिर सिंधिया के भाजपा में जाने के बाद दिग्गी पुत्र जयवर्धन सिंह को ग्वालियर चम्बल अंचल में चेहरा बनाने की कोशिश की जा रही है, या यूँ कहें कि जयवर्धन सिंह को आगामी विधानसभा चुनाव में युवा मुख्यमंत्री चेहरे के रूप में पेश किया जाए तो बड़ी बात नहीं होगी । कांग्रेस मुक्त भारत बनाने में भाजपा से कहीं अधिक खुद कांग्रेस की ही भूमिका है, इसके दो दो कारण हैं पहला तो ये कि केंद्रीय नेतृत्व के अलावा प्रदेश नेतृत्व में ऊर्जावान और करिश्माई चेहरे की कमी और दूसरा बड़ा कारण अपने अपने वर्चस्व को स्थापित करने के पीछे निजहित को संगठन से अधिक महत्व देना । नेतृत्व का अपने कार्यकर्ता से संवाद की कमी भी एक कारण हो सकता है, कांग्रेस का सोशल मीडिया वार कमजोर है, आई टी सेल कमजोर है विपक्ष की भूमिका का निर्वहन भी उतनी मजबूती से से नहीं हो रहा है, राजनीति के लिए कहा जाता है कि पक्ष मजबूत तब होता है जब विपक्ष कमजोर होता है, सूबे में ऐसे कई मुद्दे हैं जिन पर सत्ता पक्ष को घेर कर जनता के समक्ष खुद की जनहित सोच को पेश किया जा सकता है लेकिन उम्र के ढलते पड़ाव पर कमलनाथ ऊर्जा के साथ नेतृत्व नहीं कर पा रहे हैं, इसके अलावा कमलनाथ के पास नेता प्रतिपक्ष और पीसीसी चीफ की जिम्मेदारी है जिसके कारण कहीं न कहीं अन्य खेमों में आंतरिक द्वेष भी है । अपने अस्तित्व को खोने में कांग्रेस के दो कारण है पहला सक्रिय नेतृत्व की कमी और वर्चस्व की लड़ाई में संगठन को किनारे करना ।

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Chief Editor JKA

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