अपनी बात : सम्मान एक – हकदार अनेक

✒️ देव श्रीमाली.…
मैं जब 1986 में ग्वालियर आया था तब यह शहर मेरे लिए सपनों का शहर था । अब अपनो का शहर है । तब कुछ दिन रुका फिर लौट गया भिण्ड क्योंकि मुझे भिण्ड की बहुत याद आती थी। लेकिन कुछ दिनों बाद श्री रवींद्र श्रीवास्तव उरई से आचरण ग्वालियर में आ गए । वे मुझे ग्वालियर आने के लिए दबाव बनाते तो कभी ललचाते थे। उन्होंने ये भी कह दिया तुम्हारी जितनी तनख्वाह मिले तुम आने जाने पर उड़ा देना रहो मेरे साथ । तब मैं भिण्ड की गलियों में घूमकर खबरे जुटाता था और दिल्ली,भोपाल से लेकर ग्वालियर तक के पत्र-पत्रिकाओं में लिखकर अपनी पहचान बनाने में जुटा था । तब भिण्ड साहित्य की राजधानी जैसी थी । डॉ ओम प्रभाकर,दरवेश,ए असफल रामानंद स्वर्ण ,काजी तनवीर,महेश तन्हा, महेश कटारे सुगम ,डॉ विनोद सक्सेना, रघुपति सिंह सिंदोस,ओम प्रकाश नीरस,टंडन जी प्रदीप वाजपेयी ,सुखेदव सेंगर और भी एक से बढ़कर एक नाम थे जो देश के साहित्यिक जगत में तो श्री रामभुवन सिंह कुशवाह ,सुरेश जैन,त्रियुगी नारायण शर्मा, केपी सिंह जैसे अनेक सितारे भिण्ड में रहकर तो आलोक तोमर पहले ग्वालियर स्वदेश और फिर जनसत्ता दिल्ली में पहुंचकर देश की पत्रकारिता में धूम मचा रहे थे । बेमन से सही रवींद्र जी का दवाब मुझे ग्वालियर ले आया ।
ग्वालियर मेरे लिए वीराने जैसा था बस कुछ लोग ही पहचान के थे । मुझे सम्पादक डॉ राम विद्रोही जी से मिलने उनके घर भेजा गया। वे जनकगंज थाने के पास रहते थे । उनसे मिला । वे मेरे प्रशंसक थे लेकिन नौकरी देने से यह कहते हुए इनकार कर दिया – अंग्रेजी से हिंदी तर्जुमा नही आता तो पत्रकारिता कैसे कर पाओगे ? कोई सरकारी नौकरी ढूंढ लो। उनकी बात सच थी तब हिंदी की न्यूज एजेंसी नहीं थी पीटीआई और यूएनआई थी । मैने भिण्ड की ठसक में कहा- भाई साहब पत्रकार तो मैं बन ही चुका हूँ और वही रहूंगा। वे हतप्रभ रह गए लेकिन उनकी पत्नी और मेरी पूज्य भाभी जी मुस्कराते हुए परांठे लाई और बोली दो पराठे खाकर जाओ । मैँ पढ़ती हूँ । बहुत अच्छा लिखते हो । लेकिन डॉ विद्रोही स्थितप्रज्ञ रहे । मै उदासभाव लिए पैदल- पैदल आचरण पहुंचा । वहां श्री राकेश अचल बैठे थे । वे तब सिटी चीफ थे । उन्होंने चेहरा पढ़ लिया और बगैर कुछ पूछे खुद ही बोलने लगे । बोले- अरे परेशान न होओ। कुछ दिनों में बड़ा उलटफेर होने वाला है तब आ जाओगे लेकिन भिण्ड वापिस मत जाओ । यहां अच्छे पत्रकारों की बहुत कमी है । तुम ऐसा करो , चम्बल वाणी चले जाओ । कुछ दिन वहां काटो। उन्होंने फोन उठाकर चौबे जी(काशीनाथ चतुर्वेदी जी) से कहा देव को कुछ दिन अपने पास रख लो नही तो ये फिर भिण्ड भाग जाएगा । अगले महीने तक वह आचरण जॉइन कर लेगा।
बहरहाल में एक हफ्ते चम्बल वाणी में रहा और फिर आचरण में आ गया । तनख्वाह लगी सवा दो सौ रुपये। डॉ विद्रोही,अचल जी ,डॉ केशव पांडे जी ने भाई से स्नेह और मार्गदर्शन दिया ऐसे अनेकानेक साहित्यकार,पत्रकार,व्यापार और सामाजिक क्षेत्र के लोग है जिन्होंने मुझे प्रोवेशनर में बच्चे की तरह पाला । मुझ पर कठोर निगरानी रखी और भटकने नहीं दिया ।जरूरी होने पर डांटा,फटकारा,प्यार किया और ठोक- ठोक कर तैयार किया। वह ग्वालियर की पत्रकारिता का सचमुच उत्कृष्ट दौर था । उपरोक्त के अलावा सर्वश्री शिवदयाल अष्ठाना,राजेन्द्र शर्मा, जयकिशन शर्मा, बच्चन बिहारी ,शकील अख्तर ,डॉ सुरेश सम्राट कैलाश परिहार ,राजेन्द्र श्रीवास्तव, अवध आनंद , गिरीश उपाध्याय जैसी पत्रकारिता की चलती फिरती किताबें मौजूद थी । सब भाईचारे के बीच रहते यानी साँझी विरासत थी और मैं सदैव सबका लाडला रहा । आचरण के मालिक ए एच कुरेशी की अच्छे पत्रकार ढूंढने और तराशने की पारखी नजर भी मौजूद थी । कुछ साल दैनिक भास्कर में गुजारे तो एलएन शीतल और इंद्रभूषण रस्तोगी जैसे संपादक से सबका पड़ा जिन्होंने मेरी पतंग भी उड़ाई और सीमाएं भी सिखाई। तब जन सम्पर्क विभाग सिर्फ खबरे भेजने तक सीमित नही था अच्छे पत्रकार गढ़ने का भी ठिकाना था । इसके बड़े शिल्पकार भरत चंद्र नायक, पीएन द्विवेदी से लेकर आरएमपी सिंह तक और डॉ एचएल चौधरी से लेकर वर्तमान अधिकारियों तक ( क्षमा करें सबके नाम उल्लेख सम्भव नही है) थे और तब से इस विभाग के हर अधिकारी, कर्मचारी ने मुझ पर कड़ी नजर रखी । अनेक बार गलती होने पर इस विभाग के भृत्य और ड्रायवरों तक ने अकेले में ले जाकर विनम्रतापूर्वक टोका और लोगों की बातें भी बताईं और सचेत भी किया। ग्वालियर और प्रदेश के नई पीढ़ी के अनेक युवा पत्रकार भी अभी भी लगातार मेरी रगड़ाई करके रोज ही तराशने में लगे रहते हैं।
जब देश मे समाचार की नई विधा यानी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आई तो मैंने चुनौती लेकर इसमें कदम रखा तब देश मे कुल जमा चार न्यूज चैनल थे । इनमे से एक स्टार न्यूज में मुझे राजकुमार केसवानी जी लेकर गए । तब एनडीटीवी इसका प्रोडक्शन हाउस था । हिंदी और अंग्रेजी के बुलेटिन आते थे । वे कड़क ब्यूरो चीफ थे । बाद में संदीप भूषण और रुबीना खान शापु के साथ एनडीटीवी में काम करने का मौका मिला और अब अच्छे पत्रकार अनुराग द्वारी है । इस बीच स्टार न्यूज शुरू हुआ तो मैं इससे भी जुड़ा रहा । ब्रजेश राजपूत और देशदीप सक्सेना के साथ काम किया । यानी मुझे हर पीढ़ी के साथ काम करने और नवाचार सीखने का मौका मिला ।फिर सच बात ये है कि इन सबने पूरी शिद्दत से मुझे तराशा । इतना कि लोग मुझे इनकी प्रतियोगिता में खड़ा करने लगे । वे इस पर भी मुस्कराते रहे और मुझे यहां तक ले आये । मेरे परिवार ने मेरे लिए जितना संघर्ष झेला वह अद्भुत है । मैं मेधावी छात्र था । 1986 में संघ लोकसेवा आयोग में और 1987 – 88 में राज्य लोक सेवा आयोग में चयनित हुआ। पटवारी,शिक्षक और पोस्ट ऑफिस तक की नौकरियों के लिए चयनित हुआ । मध्यमवर्गीय परिवार के लिए यह स्वप्न जैसा था लेकिन मेरा सपना सिर्फ पत्रकार बनना था । मेरे मित्र भी यही चाहते थे जिन्होंने जीवनभर मेरे कंधे पर हाथ रखा । उन सबके नाम लिखना संभव नही है लेकिन कल उनकी प्रसन्नता ऐसी थी मानो वे चांद पर पहुंच गए हों । मेरे पिता,भाई ,बहिनों और परिजनों ने मुझे मूर्ख की श्रेणी में नही रखा और मेरे सपने के साथ खड़े होने का साहस दिखाया। मेरी पत्नी सहज ,सरल और सीधी- साधी है । दीन दुनिया से दूर । उन्होंने अल्प साधनों में परिवार को कुशलता से संचालित कर अपनी अगली पीढ़ी को आगे बढ़ाने का बीड़ा उठाया और बच्चों ने पिता के भाव को समझकर उसे निर्दोष बनाये रखने के लिए अपनी इच्छाओं को उपलब्धता की चादर में लपेटते हुए अपनी यात्रा पूरी की । जब मुझे 1990 में ग्वालियर विकास समिति ने संभाग के सर्वश्रेष्ठ रिपोर्टर सम्मान के लिए चुना तब मैं भिण्ड में रहने चला गया था । गोयनका पत्रकारिता अवार्ड जैसा स्थान पा चुका उदभव एक्सीलेंस पत्रकारिता अवार्ड ।
कल उदभव ने मुझे एक्सीलेंस जर्नलिज्म अचीवमेंट अवार्ड दिया । यह केंद्रीय मंत्री श्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के हाथों प्राप्त हुआ और इंडिया टुडे के वरिष्ठ रिपोर्टर और भारत के सूचना आयुक्त उदय माहुरकर ,बंसल न्यूज के श्री शरद द्विवेदी दैनिक भास्कर के सम्पादक मित्र धर्मेंद्र सिंह भदौरिया मेरे एक और मित्र हरिभूमि के संपादक श्री प्रमोद भारद्वाज और नई दुनिया के उदीयमान पत्रकार उज्ज्वल शुक्ला तथा मित्र संदीप पौराणिक के साथ मिला तो गौरवान्वित भी हुआ और भावुक भी । मेरी भावुकता तब अवाक रह गई जब बंसल न्यूज के संपादक मंच से अवार्ड लेकर सीधे मेरे पास आये और उन्होंने मेरे बाकायदा चरण स्पर्श कर आशीर्वाद मांगा । दरअसल वे मेरे लिए नही झुके थे इस बात का मुझे एहसास है बल्कि वे उन लोगों के लिए झुके थे जिनका उल्लेख मैंने ऊपर किया वे कुछ नाम नाम भर नही है उनमें अनेक और नाम छुपे है । यह एक परंपरा के संवाहक हैं।इन्ही ने भिण्ड से दो जोड़ी कपड़े और सिर्फ एक सर्वोदयी थैला कंधे पर डालकर ग्वालियर आये एक युवा को तराशा । दरअसल मुझे मिला अवार्ड और सम्मान इन्ही के लिए है । इन्ही का है । मैं सिर्फ इसे इनकी तरफ से ग्रहण करने गया था ।
( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं )

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