महापौर और अध्यक्ष चुनाव में दोहरी प्रणाली, भाजपा का ये यू टर्न

मध्य प्रदेश में नगरीय निकाय चुनाव को लेकर महापौर और नगरपालिका के अध्यक्ष के निर्वाचन की प्रणाली को लेकर पिछले कई दिनों से चल रहा असमंजस खत्म हो गया है । अब प्रदेश में नगर निगम के महापौर का चुनाव सीधे जनता करेगी. वहीं नगर पालिका और नगर परिषद के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव पार्षद करेंगे । शिवराज सरकार ने इस आशय का एक अध्यादेश राज्यपाल को भेजा था । इस अध्यादेश को राज्यपाल ने मंजूर कर लिया है । कमलनाथ सरकार ने महापौर और नगर पालिका के अध्यक्ष का चुनाव अप्रत्यक्ष प्रणाली से चुनाव कराने का बदलाव किया था । अब शिवराज सरकार ने सिर्फ महापौर का चुनाव प्रत्यक्ष प्रणाली से कराने का बदलाव किया है।. नगरीय निकाय चुनाव में नगर पालिका और नगर परिषद के अध्यक्षों का चुनाव अप्रत्यक्ष प्रणाली से ही होगा। प्रदेश में 16 नगर निगम और करीब 300 नगर पालिका और नगर परिषद है जहां चुनाव होंगे ।
नगरीय निकायों के महापौर, परिषद और पालिका अध्यक्षों के चुनाव प्रत्यक्ष हों या अप्रत्यक्ष, इसे लेकर भाजपा में ही अलग-अलग सुर सुनाई दे रहे हैं। विधायक संगठन पर दबाव बना रहे हैं कि चुनाव अप्रत्यक्ष तरीके से ही कराए जाएं, यानी पार्षद के जरिये महापौर या अध्यक्ष चुने जाएं। इस विरोध की कई वजह बताई जा रही हैं। गौरतलब है कि मप्र में प्रत्यक्ष निर्वाचन के जरिए ही महापौर और अध्यक्षों का चुनाव होता था लेकिन 2019 में कमल नाथ सरकार के कार्यकाल में इसे बदल कर अप्रत्यक्ष निर्वाचन का नियम बनाया गया था। पार्टी सूत्रों के अनुसार विधायकों को लगता है कि सीधे चुनाव में निर्वाचित होकर नगर पालिका अध्यक्ष और महापौर विधानसभा टिकट के लिए दावेदारी करने लगता है। 2019 में कमल नाथ सरकार ने मध्य प्रदेश नगर पालिका अधिनियम में संशोधन कर महापौर, नगर पालिका एवं नगर परिषद के अध्यक्षों के सीधे निर्वाचन को खत्म कर दिया था। इसे शिवराज सरकार ने दिसंबर 2020 में अध्यादेश लाकर खारिज कर दिया था। लेकिन विधानसभा से विधेयक पारित नहीं होने के चलते यह अध्यादेश स्वत: समाप्त हो गया था। पिछले दिनों भाजपा सरकार ने फिर अध्यादेश का ड्राफ्ट तो तैयार किया लेकिन वह जारी नहीं हो पाया है।
शिवराज सरकार ने किया संशोधन
यहां बता दें कि पहले कमलनाथ सरकार ने महापौर/नगर पालिका के अध्यक्ष का चुनाव अप्रत्यक्ष यानी पार्षदों के जरिए किए जाने का संसोधन किया था । अप्रत्यक्ष प्रणाली से दो नगरीय निकायों में चुनाव भी हो गए । अब शिवराज सरकार ने कांग्रेस की कमलनाथ सरकार का एक और फैसला पलट दिया है, लेकिन आधा ही।. शिवराज सरकार सिर्फ महापौर के चुनाव जनता से करा रही है । लेकिन नगर पालिका और नगर परिष्दों के अध्यक्षों का चुनाव अप्रत्यक्ष प्रणाली से ही होंगा। मध्यप्रदेश में पहली बार नगरीय निकाय के चुनाव एक ही समय में दो अलग-अलग प्रणाली से होंगे । नगर निगम का महापौर वोटर सीधे चुनेंगे और नगर पालिका के अध्यक्ष का चुनाव निर्वाचित पार्षदों के वोटों से होगा । पिछले चुनाव में जनता ने सीधे ही अध्यक्ष और महापौर का चुनाव किया था । निकाय चुनाव में दो अलग-अलग प्रणाली लागू किए जाने को बीजेपी की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है. जिन शहरों में नगर निगम है, वहां बीजेपी चुनावी दृष्टि से मजबूत स्थिति में मानी जाती है । लेकिन, छोटे शहरों में राजनीतिक समीकरण बदलते रहते हैं । बीजेपी के लिए बड़ी चुनौती उन नेताओं को साधे रखने की है जो ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में आए हैं ।
तीन साल से प्रशासक संभाल रहे हैं नगरीय निकाय
मध्यप्रदेश में नगरीय निकाय के चुनाव 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद होना था । निकायों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद कमलनाथ के नेतृत्व वाली तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने चुनाव को टाल दिया था । निकाय में प्रशासक नियुक्त कर दिए गए थे. मार्च 2020 में 28 विधायकों के दलबदल किए जाने के कारण कांग्रेस सरकार का पतन हो गया था । कांग्रेस सरकार ने नगरीय निकायों के नए परिसीमन के साथ-साथ चुनाव अप्रत्यक्ष प्रणाली से कराए जाने का फैसला लिया था । भारतीय जनता पार्टी ने इस फैसले का खुलकर विरोध भी किया था । निर्वाचन प्रणाली में परिवर्तन के बाद कमलनाथ पर बीजेपी नेताओं ने यह आरोप भी लगाए थे कि वे निकायों में जोड़तोड़ की राजनीति का प्रश्रय दे रहे हैं ।
सिंधिया समर्थक की दावेदारी कमजोर करने की रणनीति?
नगर पालिका के लिए अलग और नगर निगम के लिए अलग कानून की दोहरी व्यवस्था को लागू करने से पहले बीजेपी में लंबा विचार मंथन चला । भारतीय जनता पार्टी की चिंता नगर पालिका और नगर पंचायत चुनाव के टिकट वितरण के बाद उभरने वाले असंतोष को लेकर ज्यादा दिखाई दे रही है। बीजेपी का आंतरिक अनुमान यह है कि नगर पालिका और पंचायत चुनाव में टिकट के दावेदार अपेक्षाकृत अधिक होगें । वे लोग भी अध्यक्ष पद के लिए टिकट की दावेदारी जताएंगे जो कि ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में आए हैं।. ऐसे लोग नगर पालिका और नगर पंचायत क्षेत्र में अधिक हैं । नगर निगम क्षेत्र में डैमेज कंट्रोल करना भी आसान है।. नगर पालिका और नगर पंचायत क्षेत्र में अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली का रास्ता अपनाकर बीजेपी ने सीधे अध्यक्ष पद की दावेदारी जताने वाले लोगों की संख्या सीमित कर दी है।. नई व्यवस्था में अध्यक्ष बनने के लिए पहले पार्षद बनना जरूरी है । परिषद में पार्टी का बहुमत आने के बाद अध्यक्ष तय करना ज्यादा मुश्किल नहीं होगा । बहुमत के लिए कहीं दलबदल भी कराना पड़ा तो अध्यक्ष पद का प्रस्ताव भी दिया जा सकता है. राज्य में विधानसभा के चुनाव अगले साल के अंत में होना है ।

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