दीपावली – किसान के घर कैसे जलेंगे दीप

इंजी. वीरबल धाकड़
दीपावली यानी की दीपों का त्यौहार चारों तरफ रौनक, खुशियां उत्साह के साथ – साथ चहल – पहल इस त्यौहार की पहचान है । लोगों की जिंदगी में सनातन परंपरा के तीज त्यौहार एक अहम स्थान रखते हैं । हर बार की तरह इस बार भी दिवाली की तैयारी हर कोई अपने अपने स्तर पर कर रहा है , इन सबके बीच एक ऐसा वर्ग जो देश की शान कहा जाता है जिसके लिए दशकों पहले एक प्रधानमंत्री ने जय लगाकर नारा दिया था । वह आज हताश और टूटा हुआ है वह वर्ग किसान हैं । मध्यप्रदेश में ही नहीं बल्कि समूचे भारत में अन्नदाता की हालत बेहतर से बदतर होती जा रही है और सरकारें उसे बदतर से बेहतर दिखाने की कोशिश में लगी हैं । अत्यधिक बारिश होने के कारण फसलें गल गई ,जो लहलहाती फसलें सिनेमा जगत की शान बढ़ाती थी वह अब केवल कैमरे की कैद तक ही सीमित रह गए । किसान के खेतों में तो श्मशान बना हुआ है ऐसे हालातों में किसान के घर में इस दिवाली पर खुशियों के दीप कैसे जलेंगे यह सवाल चिंता जनक है।
फसलें खराब होने के कारण और कर्ज ना चुका पाने की स्थिति में अन्नदाता के गले को कर्ज ने फंदे में फंसा कर जीवन लीला समाप्त करने के लिए विवश कर दिया है। सोना उगलने वाली धरती अब किसानों के लिए कब्रिस्तान बनती जा रही है । अकेले मध्य प्रदेश के तथ्यों पर गौर किया जाए तो आंकड़े चौंकाने वाले सामने आते हैं समूचे भारत में हृदय प्रदेश किसान आत्महत्या के बढ़ते आंकड़ों के साथ चौथे पायदान पर है । विगत 5-6 वर्षों में लाखों की संख्या में किसान अपनी जीवन लीला समाप्त कर चुके हैं । जिस प्रदेश में हैप्पीनेस विभाग हो उसी प्रदेश में किसान आत्महत्या का ग्राफ बढ़े,इससे चिंताजनक विषय क्या हो सकता है । किसान केवल राजनीति का मोहरा है जिसे हर एक सरकार लूटती और खसोटती आ रही है । विकास के नाम पर ठेंगा दिखाने वाले राजनीतिक दल एक- दूसरे पर आरोप- प्रत्यारोप लगाकर किसान की झोली में केवल और केवल जुमले डालते हैं। कोई भी सरकार किसानों के प्रति संवेदनशील दिखाई नहीं देती है। किसानों की खेती में लागत मूल्य बढ़ता ही जा रहा है और फसलों की कीमत लगातार घट रही है। इस वर्ष पिछले वर्ष की तुलना में कृषि विकास दर प्रचलित दर और स्थिर दर का प्रतिशत बढ़ाकर दिखाया गया और लगातार पांचवीं बार कृषि कर्मण अवार्ड जीतकर प्रदेश सरकार ने अपनी पीठ खुद ही थपथपा ली बावजूद इसके किसानों के दिलों में दर्द और आंख से खून के आंसू कम नहीं हुए हैं । सरकारें अपने कामों की ब्रांडिंग और मार्केटिंग कर रही है किंतु जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन नहीं ।
किसानों की आत्महत्या के बढ़ते आंकड़े इस बात का प्रमाण देते हैं कि सरकार द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट विश्वसनीय नहीं है। फसलों का उचित मूल्य नहीं मिल रहा,किसान फसलों को सड़क पर फेंकने को मजबूर हैं । और योजना आयोग ,आर्थिक और सांख्यिकी विभाग किसानों की अतिरिक्त आय में इजाफे का ढिंढोरा पीट रहा है । किसान जब सरकार के सामने अपने जायज मांगे रखता है तो या तो उसके सीने को गोलियों से छलनी किया जाता है या फिर थानों में नंगा करके चाबुक मारे जाते हैं । इतना ही नहीं किसानों के हितों को दबा देने बाली सरकार के नुमाइंदे कर्जमाफी को फैशन बताते हैं तो कर्ज माफ करना असंभव है कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं ।
किसान आत्महत्या ने भारत में एक विशाल रूप धारण कर लिया है और यह समस्या एक राष्ट्रीय समस्या के रूप में सरकार के सामने चुनौती के रूप में है। माननीय उच्चतम न्यायालय भी इस मुद्दे पर केंद्र सरकार को सचेत कर चुका है। किसान आत्महत्या के मामले बुंदेलखंड और महाराष्ट्र ही बदनाम है लेकिन अन्य राज्यों की स्थिति कमोवेश यही है। सरकार किसानों को मुआवजा देकर जिम्मेदारी पूरा करना चाहती है जो समस्या का हल नहीं है। सरकारों को चाहिए कि ऐसी योजनाएं क्रियांवित करने करें जो हताश किसान को संबल प्रदान कर सके ।विभिन्न योजनाओं के माध्यम से कृषि उपकरण उत्तम बीज ,उच्च गुणवत्ता की खाद के साथ साथ किसानों को उनकी फसलों का उचित समर्थन मूल्य प्रदान करना चाहिए। भारतीय राजनीति में अच्छे लोगों की कमी किसानों के प्रति संवेदनशीलता को मारती जा रही है। भारत में आज भी यही सोच है कि खेती से हम अधिक लाभ प्राप्त नहीं कर सकते हैं। सोच को बदल कर हमें खेती को लाभ का धंधा बनाना होगा।
किसान की वर्तमान दुर्दशा अत्यंत ही चिंताजनक है। मौसम की मार ने फसलों को स्वाहा कर दिया तो बैंक और साहूकारों के कर्ज ने किसान की कमर तोड़ दी है। बच्चों की शिक्षा की चिंता तो बेटी के हाथ पीले करने का दायित्व पूरा करने की सोच ने माता पिता की नींद और चैन छीन लिया है । ऐसे में एक किसान के घर में दीपावली पर माहौल कैसा रहेगा , कैसे उसके घर की देहरी पर दीपक की रोशनी जगमग होगई, लेशमात्र सोच से मन में पीड़ा महसूस होने लगती है ।
( ये लेखक के निजी विचार हैं )

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