ग्वालियर राजनीति के दादाओं का गढ़

दादा शब्द का अपना – अपना अर्थ होता है, रिश्तों में पिता के पिता को दादा कहा जाता है जो कि एक परिवार के लिए वटवृक्ष होता है जिसकी छाँव में परिवार के लोग संस्कार पाते हैं, आजकल बड़े भाई को भी दादा की संज्ञा दी जाने लगी हैं । इसके अलावा अपने इलाके में रौब से रहने वाले व्यक्ति को भी लोग दादा ही कहते हैं । ग्वालियर अंचल में राजनीति के दादा बहुत हैं और उनका अपना अपना वर्चस्व भी है, इनमें दादा दयालु,बजरंगी दादा,और नारू दादा शामिल हैं ।
पूर्व सांसद और पूर्व मंत्री अनूप मिश्रा को उनके समर्थक दादा दयालु के नाम से ही पुकारते हैं, दादा दयालु मुरैना संसदीय क्षेत्र से सांसद रहे हैं और मध्यप्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री भी, दादा दयालु पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी के भांजे हैं, वे भितरवार विधानसभा क्षेत्र से लगातार चुनाव हारने के बाद पार्टी में हाशिए पर है । बजरंगी दादा यानी जयभान सिंह पवैया, बजरंगी दादा ग्वालियर से सांसद रहे हैं और मध्यप्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री भी । 2018 के विधानसभा चुनाव में वे कांग्रेस के प्रद्युमन सिंह तोमर से चुनाव हार गए,अब खुद तोमर भाजपा में शामिल हो गए हैं, ऐसे में बजरंगी दादा का राजनैतिक भविष्य खतरे में है । बजरंगी दादा बजरंग दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे हैं और राम मंदिर मामले में चर्चित रहे हैं, अंचल से महल विरोधियों में बजरंगी दादा का नाम शुमार था । नारू दादा शिवराज सरकार में ग्रह मंत्री हैं, डॉ नरोत्तम मिश्रा को लोग प्यार से नारू दादा बुलाते हैं, नारू दादा को भारतीय जनता पार्टी का संकट मोचक भी कहा जाता है, वे सरकार में नम्बर दो पर है । ग्वालियर अंचल राजनीति के दादाओं का गढ़ बन गया है ।

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