राजनैतिक भविष्य बचाने बजरंगी दादा ने पकड़ा महाराज का हाथ

ग्वालियर की राजनीति के समीकरण अब हर रोज बदल रहे हैं । रियासत के महाराज अब सियासत के कार्यकर्ता बनने की कोशिश में हैं, वे अब केंद्रीय मंत्री होकर भी आम आदमी बनकर जनता के दिल में जगह बनाने में लगे हैं । सिर पर रियासत का ताज पहनने वाले महाराज अब सियासत में सफाईकर्मी के चरणों की धूल माथे पर लगा रहे हैं । आजकल बिल्कुल मामा के अंदाज में हर एक कार्यकर्ता को तवज्जों देना और सबको साथ लेकर सबको विश्वास दिलाने की जद्दोजहद में है कि उनका प्रयास सबका विकास ही है और इससे आगे कुछ और नहीं । सियासत के मैदान में अपनों से मात खा चुके महाराज अब उस टीस को भुलाकर भविष्य गढ़ने में लगे हैं । सत्ता से लेकर संगठन और प्रशासन में वे अपने मोहरे बिठाने में लगे हैं ताकि सियासी शतरंज में किसी से मात न खाएं ।
सूबे में भले ही सरकार शिव की हो लेकिन ग्वालियर अंचल में राज तो महाराज का चल रहा है । कांग्रेस से हाथ झटककर कमल दल में आने वाले नेता महाराज की कृपादृष्टि से सत्ता की मलाई का भरपूर आनंद ले रहे हैं तो अपने राजनीतिक भविष्य को बचाने के लिए कमल दल में उपेक्षा का शिकार नेता भी अब महाराज की जय जयकार कर रहे हैं । गाहे बगाहे ही सही अब वे महाराज का बखान कर देते हैं । जिन बजरंगी दादा की राजनीति महाराज और महल के विरोध की राजनीति से अस्तित्व में आई अब वे ही बजरंगी दादा पलक पावड़े बिछाकर महाराज की आवभगत में लगे हैं, दादा 2018 का विधानसभा चुनाव महाराज के शिष्य से हार गए तो 2020 के उपचुनाव में दादा की पार्टी ने महाराज के समर्थक को न केवल टिकिट दिया बल्कि सूबे में माननीय मंत्री भी बना दिया, अब ऐसे में अपने राजनीतिक भविष्य की चिंता करते हुए बजरंगी दादा ने महाराज का हाथ थामना ही उचित समझा , वैसे भी कहने वाले कहते हैं कि सूबे के मुखिया निकट भविष्य में महाराज हो सकते हैं और राजनीति में कुछ भी हो सकता है और वो तब कि जब राजनीतिक दल भाजपा हो । राजनीतिक गलियारों में चर्चा चल पड़ी है कि महाराज भाजपा में मजबूरी के चलते आए तो अब बजरंगी दादा भी कमल दल को मजबूती देने साथ होने का भले ही बोलें लेकिन मजबूरी ने दो धुर विरोधी को साथ बिठाया है ।

Subscribe to my channel



