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विकास के बाद भी छिटके वोट बैंक पर सोशल इंजीनियरिंग की राजनीति

आलेख :
अब तक जातिगत समीकरणों के प्रभाव से दूर रही मध्य प्रदेश की सियासत भी सोशल इंजीरियरिंग के दौर में प्रवेश कर चुकी है। वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव में आदिवासी सहित कुछ वर्गों के मुंह मोड़ने के चलते सत्ता से बाहर हुई भाजपा ने सबक लेते हुए 2023 के विधानसभा और 2024 के लोस चुनाव के लिए अभी से जातिगत समीकरणों पर गंभीरता से काम करना शुरू कर दिया है। राज्यपाल के मनोनयन से लेकर सत्ता व संगठन में हर वर्ग को साधने की कोशिश की गई है । वहीं कोई कसर न छोड़ने की तर्ज पर नए नए प्रयोग कर रही है, जनजातीय समुदाय के नेताओं, स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों से लेकर राजा रानियों को महत्व देना शुरू कर दिया गया है ।

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वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव में आदिवासी वोट बैंक ने भाजपा से मुंह मोड़ लिया था। इसका नतीजा रहा कि 2013 में इस वर्ग के प्रभाव वाली 47 सीटों में से जहां भाजपा के पास 32 सीटें थीं, वहीं 2018 में ये घटकर 22 रह गईं थी। साथ ही अनुसूचित जाति की सीटें भी घट गईं थीं। इससे सत्ता तक पहुंचाने वाला सीटों का गणित बिगड़ गया था। ऐसे में भाजपा अब सतर्क है। आदिवासी वोट बैंक के लिए नए चेहरे गुजरात से मंगुभाई पटेल को राज्यपाल बनाया गया है। पार्टी में दलित वर्ग का प्रमुख चेहरा रहे थावरचंद गहलोत की मोदी कैबिनेट से विदाई हुई तो उन्हें कर्नाटक का राज्यपाल बना दिया गया। उनकी जगह दलित वर्ग से डॉ. वीरेंद्र कुमार को मोदी कैबिनेट में जगह दी गई। ओबीसी से खुद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान आते ही हैं, वहीं ब्राह्मण वर्ग से वीडी शर्मा प्रदेश अध्यक्ष हैं, जबकि सवर्ण में राजपूत वर्ग से नरेंद्र सिंह तोमर केंद्रीय मंत्री हैं।

सियासी गलियारों में यह कहा जा रहा था कि भाजपा अब हिंदुत्व की बजाय सोशल इंजीनियरिंग की राजनीति पर ज्यादा ध्यान दे रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी मंत्रिपरिषद के विस्तार में भी यहीं संकेत दिया था। बड़ी शान से सरकार की ओर से बताया गया कि रिकार्ड संख्या में ओबीसी और एससी-एसटी मंत्री बनाए गए हैं। मोदी सरकार में उत्तर प्रदेश से छह मंत्री शामिल किए गए थे, जिनमें से एक ब्राह्मण, तीन ओबीसी और दो एससी समुदाय के थे।
जातिगत गोलबंदी के चुनावी खतरे का सत्तारूढ़ भाजपा को भी बखूबी अहसास है जो सूबे में लगातार चौथी बार विधानसभा चुनाव जीतने के लिये एड़ी-चोटी का जोर लगा चुकी है । प्रदेश की कुल 230 विधानसभा सीटों में से 47 सीटें अनुसूचित जनजाति (एसटी) समुदाय के लिये आरक्षित हैं, जबकि 35 सीटों पर अनुसूचित जाति (एससी) वर्ग को आरक्षण प्राप्त है। यानी सामान्य सीटों की तादाद 148 है।

कांग्रेस भी इसी राह पर

भाजपा द्वारा सत्ता से संगठन तक जातीय संतुलन पर नजर रख रही कांग्रेस भी इसी आधार पर संगठन में मोर्चेबंदी की तैयारी कर रही है। जवाब में कांग्रेस अपने संगठन और विधायक दल में नई जमावट करने जा रही है। सूत्रों का कहना है कि कमल नाथ नेता प्रतिपक्ष का पद छोड़ेंगे, जिस पर अनुसूचित जाति वर्ग से किसी को मौका मिल सकता है। इस पद के लिए सज्जन सिंह वर्मा, डॉ. विजय लक्ष्मी साधौ और एनपी प्रजापति की दावेदारी मानी जा रही है। आदिवासी वर्ग को साधने के लिए विक्रांत भूरिया को प्रदेश युवक कांग्रेस की कमान पहले ही सौंपी जा चुकी है। इसी वर्ग से आने वाले बाला बच्चन को भी संगठन में प्रमुख पद सौंपने पर विचार चल रहा है। ओबीसी वर्ग को साधने के लिए जीतू पटवारी और अरुण यादव को राष्ट्रीय संगठन में जिम्मेदारी दी जा सकती है। दोनों नेता प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद के दावेदार माने जाते रहे हैं, जबकि कमल नाथ इस पर बने रहने के इच्छुक हैं, इसलिए इन्हें राष्ट्रीय संगठन में मौका दिया जा सकता है, वहीं रामनिवास रावत को प्रदेश में ही जिम्मेदारी दी जा सकती है।

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( लेखक स्वंत्रता स्तम्भकार है )

Chief Editor JKA

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