धर्म, जाति और वर्ग की पनपती राजनीति, विकास की बात नहीं

भोपाल ( राजनीतिक संवाददाता ) : समय के अनुसार परिवर्तन होना स्वाभाविक है लेकिन राजनीति इतनी और ऐसे बदल जाएगी किसी को कल्पना न होगी । विकास की बात भुलाकर और देश प्रदेश के ज्वलंत मुद्दों को ठेंगा दिखा कर राजनीति ने अब धर्म , जाति और वर्ग की राजनीति की राह पकड़ ली है । सूबे में बीते कुछ समय में पिछड़ा वर्ग के आरक्षण की माँग ने आग पकड़ी तो वर्तमान सरकार ने उसी हिसाब से वोट बैंक को साधने की भरकस कोशिश की और आरक्षण के नाम पर जनता को गुमराह करके भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों के बीच होती नूराकुश्ती किसी से छुपी नहीं है । दरअसल अब प्रदेश में ट्राइबल पॉलिटिक्स ने जन्म ले लिया है, भाजपा ने गौरव जनजातीय दिवस मनाकर बीते चुनाव में उसकी झोली से छिटके दलित वोटर को मनाने की कोशिश की । जब भाजपा ने दलित वोट बैंक की राजनीति शुरू ही कर दी तो मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस भला कैसे इस मुद्दे को अपने हाथ से जाने दे । आपको बता दें कि मध्यप्रदेश की सियासत आदिवासी वर्ग के इर्द गिर्द घूमती नजर आ रही है। 24 नवंबर को पीसीसी चीफ कमलनाथ ने आदिवासी विधायकों की बैठक बुलाई है। इसमें 89 ट्राइबल ब्लॉक के पदाधिकारी भी शामिल होंगे। वहीं, 22 नवंबर को जनजातीय गौरव दिवस का समापन मंडला में होगा। इस कार्यक्रम में सीएम शिवराज सिंह चौहान विभिन्न योजनाओं से आदिवासी हितग्राहियों को लाभान्वित करेंगे।।
ट्राईबल पॉलिटिक्स की राह पकड़ना राजनीतिक दलों की मजबूरी अपने वोट बैंक को मजबूत करने की है दरअसल 2003 विधानसभा चुनाव में आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित 41 सीटों में से बीजेपी ने 37 सीटों पर कब्जा जमाया था। चुनाव में कांग्रेस केवल 2 सीटों पर सिमट गई थी। वहीं गोंडवाना गणतंत्र पार्टी ने 2 सीटें जीती थी। जबकि 1998 में कांग्रेस का आदिवासी सीटों पर अच्छा खासा प्रभाव था।
इसके बाद 2008 के चुनाव में आदिवासियों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या 41 से बढ़कर 47 हो गई। इस चुनाव में बीजेपी ने 29 सीटें जीती थी। जबकि कांग्रेस ने 17 सीटों पर जीत दर्ज की थी। समय बदला तो भाजपा और कांग्रेस दोनों की सीटें भी बदलीं और 2013 के इलेक्शन में आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित 47 सीटों में से बीजेपी ने जीती 31 सीटें जीती थी। जबकि कांग्रेस के खाते में 15 सीटें आई थी। 2018 के इलेक्शन में पांसा पलट गया। आदिवासियों के लिए आरक्षित 47 सीटों में से बीजेपी केवल 16 सीटें जीत सकी और कांग्रेस ने दोगुनी यानी 30 सीटें जीत ली। जबकि एक निर्दलीय के खाते में गई। अब 2018 में विकसित मध्यप्रदेश का नारा देने वाली भारतीय जनता पार्टी दलित वोट बैंक के सहारे सत्ता के शीर्ष पर काबिज बनी रहने के प्रयास में है क्योंकि 2018 में इसी वोट बैंक के चलते सत्ता के मुहाने पर आकर रह गई थी, हालांकि उलटफेर कर 15 महीने बाद कैसे सत्ता में वापस आए ये भी एक दिलचस्प कहानी है।

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