PLACE-YOUR-ADVERT-HERE
add-banner
IMG-20231202-WA0031
IMG_20220718_112253
IMG-20250516-WA0020
IMG-20250516-WA0017
आलेखमध्य प्रदेशविशेषसंपादकीय

भोपाल गैस त्रासदी : वो कालरात्रि और चीखती सुबह

 

इंजी. वीरबल सिंह
दुनिया मैं शायद ऐसा समय कहीं भी और कभी भी नहीं आया होगा कि एक काली अंधेरी रात के बाद सुबह भी काली आई हो ,लेकिन देश के इतिहास के पन्नों में यह घटना काले और भयावह अक्षरों में अंकित हो गई । 2-3 दिसंबर 1984 की रात प्रकृति की धरोहर ताल-तलैयों सेल – शिखरों की सुरम्य नगरी भोपाल के लिए कहर बरसा गई । देश के इतिहास में वीभत्स ,कलंकित, क्रूर कालरात्रि के बाद सूरज भले ही आसमान में उगा लेकिन भोपाल के लिए डरावनी रात के बाद काली और चीखती सुबह आई।

No Slide Found In Slider.

उक्त घटना को “भोपाल गैस त्रासदी” के नाम से जाना जाता है । 1969 में स्थापित अमेरिकी कंपनी यूनियन कार्बाइड कीटनाशक दवाइयों का उत्पादन करती थी और 1979 में मिथाइल आइसोसाइनेट से भी कीटनाशक बनाना प्रारंभ कर दिया । कंपनी अपना काम कर रही थी और वर्ष 1984 तक आते-आते कारखाने के अधिकतर उपकरणों सहित सुरक्षा उपकरणों की हालत ठीक नहीं रही, लेकिन जिम्मेदार लोग अभी भी गैर जिम्मेदार बने हुए थे। मशीनों के संचालन के लिए प्रयुक्त अधिकतर मैन्युअल अंग्रेजी में थे और कर्मचारियों के लिए अंग्रेजी काला अक्षर भैंस बराबर थी । यही कारण था कि कंपनी में अधिकतर काम लापरवाही से हो रहे थे प्रयुक्त गैस का तापमान 4.5 डिग्री तथा लेकिन कर्मचारियों की लापरवाही के चलते 20 डिग्री तक पहुंच गया जो कि एक हादसे के लिए काफी था।

भोपाल गैस कांड विश्व की सबसे बड़ी गैस त्रासदी थी इस घटना में जहरीली गैस मिथाइल आइसोसाइनेट का रिसाव हुआ जिसने लाखों लोगों का जीवन तबाह कर दिया । अधिकारिक तौर पर माने तो 15000 से अधिक लोगों की जिंदगी को यह हादसा निगल गया । वर्ष 2006 में सरकार ने माननीय न्यायालय में स्वयं एक शपथ पत्र में स्वीकारा कि इस त्रासदी से 558125 लोग प्रभावित हुए यह तो एक सरकारी आंकड़ा है जो विश्वसनीय नहीं है, सत्य तो कुछ और ही है । मध्य रात्रि में हुए गैस रिसाव ने क्षेत्र में जब फ़ैलना शुरु किया तो चैन की नींद सो रहे लोगों को बेचैन कर दिया । यह गैस नहीं थी वह मौत का एक रूप था जिसने नवजात से लेकर बूढ़े तक किसी को नहीं बख्शा । लोगों को घबराहट होने लगी ……..सांस फूलने लगी…….. तो आंखों में मच रही जलन ने काली रात को और अंधेरा कर दिया ……….जिन लोगों में सांस के साथ गैस फेफड़ों तक पहुंची उनको हमेशा के लिए मौत की नींद सुला दिया । शहर में अफरा तफरी मच गई लोग चीख चिल्ला रहे थे । घुटते दम के कारण कुछ बोल नहीं पा रहे थे ….तो कुछ अंधे होकर भी बचाव के लिए ये इधर उधर दौड़ रहे थे । आनन फानन में लोगों को अस्पतालों में पहुंचाया गया , अस्पतालों में मरीजों को लिटाने तक के लिए जमीन खाली नहीं दिख रही थी। अस्पताल पहुंचकर भी क्या हुआ …? डॉक्टरों को इसका बचाव मालूम नहीं था , भोपाल तो छोड़िए समूचे प्रदेश में कोई भी डॉक्टर ऐसा नहीं था जिसे मिथाइल आइसोसाइनेट से बचाव का अनुभव रहा हो ।। उस क्रूर कालरात्रि ने अधिकतर उन लोगों को निकला जो गांव-गांव से आकर रोजी रोटी की जुगत में रह रहे थे । 2 दिन में ही लगभग 50000 से अधिक लोगों का इलाज किया गया लेकिन परिणाम सकारात्मक नहीं मिले ।

उस बीभत्स रात में लोग मर रहे थे और राजनीति की गद्दी पर बैठे मुखिया की मिलीभगत से शहर के जिलाधीश और पुलिस महकमा प्रमुख इस घटना के कर्ताधर्ता और कंपनी मालिक बारेन एंडरसन को शहर से सुरक्षित एयरपोर्ट तक पहुंचाने की कोशिश में थे ।। आज भी इस घटना से जुड़े कई सवाल अनसुलझे है और उनके जवाब नहीं मिल रहे हैं जैसे – इतनी घनी आबादी के बीच संयंत्र स्थापित करने की अनुमति किस आधार पर दी गई …………..संयंत्र में सुरक्षा व्यवस्था के पुख्ता इंतजाम क्यों नहीं किए गए …………संयंत्र के चेयरमैन वारेन एंडरसन पर किन धाराओं के तहत कार्यवाही की गई और उन धाराओं में से अधिकतर धाराओं को हटाकर उसका बचाव क्यों किया गया ।

PicsArt_10-26-02.06.05

गैस के जहर से जो लोग बच गए वो आज भी राजनीति का विष पीने पर विवश है। सत्ता के गलियारों के लोग सिर्फ अपनी थोथी शेख़ी बघार कर अपने कर्तव्य से विमुख होकर वोट बैंक की राजनीति साधने में लगे रहते हैं । इन 3 दशकों से भी अधिक समय में किसी भी सरकार चाहे त्रासदी के जिम्मेदार लोगों को संरक्षण देने वाली या प्रदेश के अंतिम पंक्ति के व्यक्ति के सुख दुख की बात करने बालों की रही हो ….किसी ने भी उन प्रभावित लोगों के जख्मों पर मरहम लगाने की कोशिश नहीं की । ना तो उन्हें उचित मुआवजा दिया गया और ना ही खतरो से बचने के उपाय किए गए हैं । पारा, सीसा और क्रोमियम जैसे खतरनाक तत्व आज भी वहां एकत्र मलबे में दबे हैं जो सूर्य के प्रकाश में द्रवित होकर हवा और भूजल को जहरीला कर देते हैं । उस हादसे से वहां के लोग आज तक नहीं उभरे हैं । उसका प्रभाव आज भी वहां के लोगों में देखने को मिलता है जैसे आकस्मिक गर्भपात का आंकड़ा 3 गुना बढ़ गया है…… तो नवजात में आंख ,फेफड़े और त्वचा जैसे रोग जन्मजात हो रहे हैं । उनके दिमागी विकसित गति अपेक्षित नहीं है और कैंसर के मरीजों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है । आज भी उस डरावनी रात से लेकर प्रभावित लोगों के लिए चीखती सुबह ही होती है । प्रभावित लोग तो हादसे से अंधे और बधिर हो गए थे लेकिन सत्ता की मलाई खाने वाले राजनेता अहंकार और स्वार्थ में मूक ,बधिर बन बैठे हैं और अपने दायित्व को भूल गए ।
हादसे में मृत आत्माओं को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि!

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार और वेब पोर्टल के संपादक हैं )

Chief Editor JKA

FB_IMG_1657898474749
IMG-20250308-WA0007

Related Articles

Back to top button