कैलारस शुगर मिल: 2028 में जौरा विधानसभा का सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनेगी बंद पड़ी चीनी मिल?
रोजगार, गन्ना किसान और क्षेत्रीय विकास की उम्मीदें अब भी अधूरी, भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए बड़ी राजनीतिक परीक्षा

जौरा/कैलारस। कभी चंबल अंचल की आर्थिक पहचान रही कैलारस सहकारी शुगर मिल आज वर्षों से बंद पड़ी है। एक समय हजारों किसानों की गन्ने की फसल का सहारा और सैकड़ों परिवारों के रोजगार का केंद्र रही यह मिल अब राजनीतिक बहस का विषय बन चुकी है। जैसे-जैसे वर्ष 2028 का विधानसभा चुनाव नजदीक आएगा, वैसे-वैसे यह मुद्दा जौरा विधानसभा क्षेत्र में चुनावी राजनीति के केंद्र में आ सकता है।
जौरा विधानसभा में कैलारस और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के लिए शुगर मिल केवल एक उद्योग नहीं, बल्कि किसानों की आय, युवाओं के रोजगार और स्थानीय व्यापार की जीवनरेखा मानी जाती रही है। मिल बंद होने के बाद गन्ना उत्पादन लगातार प्रभावित हुआ, स्थानीय रोजगार के अवसर घटे और क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों पर भी असर पड़ा। कैलारस की पहचान लंबे समय तक इसी सहकारी चीनी मिल से जुड़ी रही है।
राजनीतिक दृष्टि से यह मुद्दा भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए चुनौती बना हुआ है। यदि चुनाव से पहले मिल के पुनः संचालन या पुनर्जीवन की दिशा में ठोस कार्य दिखाई देता है तो भाजपा इसे अपनी उपलब्धि के रूप में जनता के सामने रख सकती है। वहीं यदि स्थिति यथावत बनी रहती है तो कांग्रेस सरकार की नीतियों और वादों को लेकर जनता के बीच सवाल खड़े करेगी। विधानसभा में भी इस विषय को कई बार उठाया जा चुका है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि शुगर मिल के बंद होने का सबसे बड़ा नुकसान किसानों, मजदूरों, व्यापारियों और युवाओं को हुआ है। रोजगार के अवसर कम होने से बड़ी संख्या में युवाओं को अन्य शहरों की ओर पलायन करना पड़ा। किसानों का मानना है कि यदि मिल फिर से चालू होती है तो क्षेत्र में गन्ना उत्पादन बढ़ेगा और स्थानीय अर्थव्यवस्था को नई गति मिलेगी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2028 के चुनाव में जनता केवल आश्वासनों से संतुष्ट नहीं होगी। मतदाता यह जानना चाहेंगे कि वर्षों से बंद पड़ी मिल को चालू करने के लिए किस दल ने क्या ठोस प्रयास किए और किसके पास भविष्य की स्पष्ट योजना है।
हालांकि यह कहना कि कोई विशेष राजनीतिक दल या व्यक्ति जानबूझकर शुगर मिल चालू नहीं होने देना चाहता है, उपलब्ध तथ्यों के आधार पर उचित नहीं होगा। ऐसे आरोपों के लिए ठोस प्रमाण आवश्यक हैं। लेकिन इतना निश्चित है कि यदि मिल का मुद्दा अनसुलझा रहा तो यह जौरा विधानसभा चुनाव में रोजगार, किसान हित और क्षेत्रीय विकास का सबसे बड़ा जनमुद्दा बन सकता है।
अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है—क्या कैलारस शुगर मिल फिर से चलेगी या 2028 के चुनाव में केवल राजनीतिक भाषणों का हिस्सा बनकर रह जाएगी? इसका जवाब आने वाले समय में सरकारों की कार्यवाही और जनता के निर्णय से तय होगा।

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