
वैसे तो गुरु की वंदना, पूजन के लिए हर एक दिन, हर एक क्षण ही महत्वपूर्ण है लेकिन भारत में हर एक के लिए एक विशेष दिन होता है । गुरुपूर्णिमा एक ऐसा पर्व है जिसे विशेष तौर पर गुरु के लिए ही मनाया जाता है । गुरु पूर्णिमा आषाढ़ मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है, इसके पीछे वेद – पुराणों में अलग-अलग तथ्य हैं …….इस दिन महाभारत के रचयिता, प्रकांड विद्वान , संस्कृत के पंडित वेद व्यास जी का जन्मदिन भी है …..साथ ही संत कबीर दास जी के शिष्य , भक्ति काल के संत घासीदास का भी जन्म दिवस है ।
गुरु को सभी देवों बड़ा माना गया है । गुरु के बिना ज्ञानार्जन संभव नहीं है तथा मानव जीवन रसहीन और कड़वा माना गया है । गुरु पूर्णिमा के दिन से 4 माह तक परिव्राजक साधु – संत एक ही स्थान पर रहकर ज्ञान की भागीरथी प्रवाहित करते हैं । गुरु को पूर्णिमा के चंद्रमा के समान ज्ञान पुंज से देदीप्यमान तथा शिष्य को आषाढ़ के घने काले बादलों की तरह माना गया है । गु का अर्थ तिमिर तथा रू का अर्थ निवारण बताया जाता है… तभी तो गुरुजी चंद्रमा के प्रकाश में शिष्य की अज्ञानता रूपी काले बादल छटकर चहुँओर अपने यश और कीर्ति की आभा बिखेरता है । शिष्य गीली मिट्टी की तरह होता है और गुरू उस माटी से सुंदर घड़ा बनाता है , जो जल रूपी गुणों को संग्रहित करके दूसरों को प्रेम , संस्कार की शीतलता प्रदान करता है ।
मानव जीवन पर्याप्त नहीं है संपूर्ण ज्ञान की प्राप्ति के लिए । गुरु ज्ञान का ही पर्याय है मगर गुरु का कोई पर्याय नहीं होता है । ज्ञान की सीमा अनंत है इसका ना तो कोई आदि होता है और ना ही अंत ……… ज्ञान अर्जित कर मानव जीवन में शिष्टाचार , संस्कार और संस्कृति का समावेश होता है । गुरु अपने शिष्य के दोषों को निकालकर सुंदर व्यक्तित्व प्रदान करता है । शिक्षा के तेज से उसके जीवन को आभा मंडित करता है । जहां छात्र को भाग्य विधाता माना गया है वही शिक्षक को युग निर्माता बताया है । ज्ञान के वेग से शिष्य के जीवन रूपी उपवन में नवीन पुष्प पुष्पित, पल्लवित होते हैं । गुरु ही है जो हमें व्यवहारिक जीवन से रूबरू कराता है । गुरु सर्वश्रेष्ठ है गुरु को ईश्वर से भी बड़ी संज्ञा दी गई है । आज आधुनिकता की भाग दौड़ में और शिक्षा के होते व्यवसायीकरण में गुरु-शिष्य की परंपरा कई छुप गई है । संतों के आचरण गुरु शब्द की मर्यादा को तार-तार कर रहे हैं । पश्चिमी सभ्यता के तले सनातन परंपरा के तीज – त्यौहार घुटन महसूस कर रहे हैं । गुरु के आधार भाव को महत्व नहीं देना चाहता है ।
इंजी. वीरबल सिंह “वीर”

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